Monday, 13 April 2015

**** ज्योतिष शास्त्र का उपदेश ****

 ****       ज्योतिष शास्त्र  का उपदेश       ****


ज्योतिष शास्त्र का उपदेश ऋषी मुनियों के मुखार बिन्दु से हुवा। हमारे देश की आस्था विश्वास और कल्याण के प्रतीक रहे साधक, ऋषी -महात्मा के निर्दिष्ट ज्ञान मे कही कोई दोष या भ्रम हो ऐसी बात नही होनी चाहिये है किन्तु उनकी समय भेदनी दृष्टि से ओझल अदृष्य़ रह गया ऐसी बात भी नही होनी चाहिये।
हम उनके कहे निर्देशों ,रहश्यों ,वाक्यो और सूत्रपात मन्त्रों को कितना सहजता से समझ पाते है, सारा दामोदार इसी बात पर आश्रित होता है।प्रायः सभी जातक को अपने जीवन मे हो रहे उथल -पुथल  की सम्पूर्ण जानकारी मिलने की प्रबल इच्छा होती। हमारे ऋषियों -मनिषियों नें मानव की इन्ही सहज जिज्ञासा को ध्यान मे रख कर ही ज्योतिष जैसे प्रकाशवान ज्ञान को शास्त्रीय स्वरूप दिया है।
हम आचार्य पंण्डित विमल त्रिपाठी जैसे अल्पज्ञानी को परम पूज्य बाबा स्व० पंण्डित अनिरुद्ध प्रसाद त्रिपाठी जी से वंश परम्परागत ज्योतिष सिद्ध हो सकी है, तपस्चरित जीवन धारी पूज्य बाबा जी स्वयं मे सिद्ध अन्तर्मुखी प्रतिभा के धनी भृगु संहिता मर्मज्ञ थे। यह भारत वर्ष भरत खण्ड की अति प्राचीन विशेषता रही है विश्व के किसी भी वाङ्ग्मयी या व्यवहार को देख लिया जाय किन्तु ऋषी शब्द ही नही मिलता है वह एक मात्र भारत देश की धरती की महिमा है। 
समुद्र तो अथाह जलाश्रोत है हमारे पास एक लोटा ही हो तो उससे अधिक सागर  हमारे लिये अर्थ हीन है उस लोटे के पात्र के स्थान पर गन्दा पात्र या रंगीन पात्र रख लेते है तो उसमे गन्दा या रंगीन दिखने वाले जल का क्या दोष ? पानी का दोष नही अपितु उस अधानपात्र का दोष है ।उसी प्रकार यदि जहां कहीं ज्योतिष निर्णय में त्रुटियां आ रही है तो ऋषि मुनियों के सूत्रपात सिद्धान्तो मे त्रुटी नही हमारी समझ मे कमी है क्योकी ज्ञान सतत प्रवाहशील बना रहता है।
सिद्धान्तो के मूल तत्वों मे विशेष परिवर्तन नही होता। देश काल परि स्थितियो के संयोजन व परिवर्तन के कारण कुछ जोडने की कुछ छोडने की स्थिति बनी रहती है।जिस कारण ना ही अकल्पित है ना ही अस्वभाविक ही।                                                    acharyavimal1234@gmail.com

1 comment:

  1. तपस्चरित जीवन धारी पूज्य बाबा जी स्वयं मे सिद्ध अन्तर्मुखी प्रतिभा के धनी भृगु संहिता मर्मज्ञ थे।

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